जिश्म की आग में जला डाला सुहाग

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प्रतीक चित्र

वाराणसी/सुल्तानपुर अवैध संबंध कथा

» टी.सी.विश्वकर्मा

वंदना ने जैसे-तैसे सामने पड़ी थाली से दो निवाले गले से नीचे उतारे और बिस्तर पर लेट गई। रात काफी बीत चुकी थी चंद्रमा आपने यौवन पर था, सर्वत्र स्वच्छ चांदनी का साम्राज्य फैला हुआ था, मगर वंदना की आंखों से नींद कोसों दूर थी, वह तो बिस्तर पर करवटें बदलती आपने भाग्य को गालियां दे रही थी। वह पति के इंतजार में जाग रही थी। मगर इसलिए नहीं कि वह इसे अपना पतिव्रत धर्म समझती है, बल्कि इसलिए क्योंकि उसका बदन टूट रहा था, उसका भरा पूरा यौवन पति के सान्निध्य के लिए तड़प रहा था। उसे आपने अंग-अंग से टीसें उठती महसूस हो रही थी। उसकी तीव्र इच्छा थी कि उसका पति आकर उसके जवान जिस्म को मथ कर रख दे।

उसका पति उमाशंकर दिल्ली में नौकरी करता था और साल में एक दो बार ही घर आ पाता था और इन दिनों वह घर आया हुआ था तो बजाय पत्नी की आकांक्षाओं को पूरा करने के आधी रात के वक्त घर से गायब था। वंदना का उन्माद बढ़ता ही जा रहा था, हालत यह हो गई कि वह किसी दूसरे पुरुष से आपनी यौनेच्छा शांत करने की सोचने लगी और इस बारे में वह जितना सोचती उसका मन उतनी ही तेजी से भटकता जाता।

इस हालत में मिला था उमाशंकर का शव

कुछ देर तक ऊल जलूल ख्यालों में भटकते रहने के बाद वह मन मारकर सोने की असफल चेष्टा करने लगी, मगर विरह के क्षणों में नींद भला किसे आती है? काफी रात बीत जाने के बाद वंदना के कानों में कुंडी खटकने की आवाज पड़ी, उसकी सारी सुस्ती काफुर हो गई, कुछ ही क्षणों में झपटकर उसने कुडी खोल दिया। किवाड़ खुलने के साथ ही उसका पति उमाशंकर कमरे में आ गया। अपने मनोभाव को छिपा वंदना ने पति के लिए खाना परोसा। खाना खा उमाशंकर बिस्तर पर गया। बिस्तर पर पड़ते के साथ ही वह गहरी निद्रा के आगोश में खो गया। वह जान भी न सका कि उसकी पत्नी कितनी उम्मीदों के साथ उसका इंतजार कर रही थी। दो दिन बाद उमाशंकर दिल्ली लौट गया और वंदना पुनः अपने भाग्य को कोसने लगी।

वंदना मूलरूप से प्रतापगढ़ जनपद के अंतु थाना अंर्तगत पुरे पीताम्बर, जगेशर गंज निवासी हरिभजन की बेटी है। हरिभजन के परिवार में उसकी पत्नी के अलावा तीन बेटी और एक बेटा रवि है। बहनों के क्रम में सबसे बड़ी थी।

साधारण परिवार में पली-बढ़ी वंदना को न सिर्फ अपने परिवेश से नफरत थी, बल्कि वह गरीबी को भी अभिशाप समझती थी, लिहाजा होश संभालने के बाद से ही उसने सतरंगी सपनों में खुद को डुबाकर रख दिया था। सपनो में जीने की वह कुछ यूं अभ्यस्त हुई कि गुजरते वक्त के साथ उसने हकीकत को पूरी तरह नकार दिया। हकीकत क्या थी? यह वह जानना ही नहीं चाहती थी, मगर उसके परिजन भला सच्चाई से कैसे मुंह मोड़ लेते। उन्हें तो अपनी हैसीयत का अंदाजा था, जैसे-तैसे वे मेहनत करके अपने परिवार का गुजारा कर रहे थे। बेटी उनके लिए बोझ भले ही न रही हो, मगर उसकी बढ़ती उम्र के साथ-साथ उनकी चिन्ता बढ़ती जा रही थी।

मृतक उमाशंकर के शव का निरीक्षण करती पुलिस

वंदना अब तक 15 साल की हो चुकी थी, गेहूंआ रंग, छरहरी काया और बड़ी-बड़ी आंखें। कुल मिलाकर वह आकर्षक युवती कही जा सकती थी। वैसे भी मुहल्ले में उसके मुकाबले कोई दूसरी लड़की नहीं थी। अतः मुहल्ले के तमाम लड़कों के आकर्षण का केन्द्र थी। वहां सभी उसका सामिप्य हासिल करना चाहते थे, या यूं कहे की उसके नजदीक आने को मरे जा रहे थे। हालत ये थी कि वह जिससे भी मुस्कराकर दो बातें कर लेती, अगले दिन वही उसके आगे-पीछे घूमना शुरू कर देता।

लड़कों को अपने आगे-पीछे चक्कर लगाते देखकर उसे बेहद खुशी मिलती थी। सुकून हासिल होता था या शायद उसके इस अहम को संतुष्टि मिलती थी कि वह बहुत खूबसूरत है। बात चाहे जो भी रही हो, मगर उसका गरूर बढ़ता जा रहा था, कदम जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। वह तो अब खुले आसमान में मुक्त भाव से विचरना चाहती थी। ऐसे में वह कब तक अपने आप को बचाकर रख सकती थी। मां-बाप बेटी के बदलते व्यवहार को देखा तो पढ़ने के लिए उसे सुल्तानपुर भेज दिया। सुल्तानपुर में रहकर वंदना महाराणा प्रताप डिग्री कालेज से ग्रेजुएशन करने लगी। यहीं उसकी मुलाकात अरूण से हुई।

अरूण मूलरूप से सुल्तानपुर के लम्बुआ थाना क्षेत्र के समहुता कला निवासी रामकिशोर का बेटा है। तीन भाई दो बहनों में सबसे छोटा अरूण भी महाराणा प्रताप डिग्री कालेज से पढ़ाई करता था। एक ही बिरादरी के होने के कारण एक बार अरूण और वंदना का परिचय हुआ तो दोनों की नजदीकियां बढ़ती ही गयी।

कहते है चिंगारी और फूंस एक जगह हो तो आग लग ही जाती है। ऐेसा ही कुछ वंदना और अरूण के साथ भी हुआ। धीरे-धीरे दोनों की नजदीकियां प्यार का रूप लेने लगी और दोनों एक दूसरे को जी जान से चाहने लगे।

मृतक उमाशंकर जिवित अवस्था में

बेटी के संबंधों की खबर मां-बाप को लगी तो उनके कदमों के नीचे से जैसे जमीन ही खिसक गई। उन्होंने पहले तो समझा-बुझा व डांट-फटकार रास्ते पर लाने का प्रयास किया, लेकिन जब उसके सुधरने के लक्षण नहीं दिखाई पड़े तो घरवालों ने आनन-फानन में उसकी शादी करके अपनी इज्जत बचा ली, यानि अपनी परेशानी उमाशंकर के गले मढ़ दी।

उमाशंकर मूलरूप से सुल्तानपुर के लम्बुआ थाना क्षेत्र के समहुता कला निवासी संतराम का बेटा था। संतराम के परिवार में पत्नी के अलावा कुल तीन बेटे और एक बेटी थी। बेटों के क्रम में सबसे छोटा अरूण हाईस्कूल तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद दिल्ली चला गया और वहीं रहकर काम-धन्धा करने लगा। वंदना के घर वालों ने उमाशंकर को देखा तो पहली ही नजर में उसे पसंद कर लिया और बात आगे बढ़ी फिर 22 फरवरी 2010 को वंदना की शादी उमाशंकर से हो गयी।

उमाशंकर का दोस्त होने के कारण अरूण ने शादी में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। विवाह के बाद कुछ दिनों तो ठीक-ठाक बीता, लेकिन कुछ दिनों के बाद जब उमाशंकर फिर काम-धन्धे के सिलसिले में दिल्ली चला गया तो वंदना शारीरिक सुख के लिए तड़पने लगी।

वैसे भी शारीरिक सुख को तड़पती किसी औरत को राह भटकते कितनी देर लगती है, फिर वंदना तो जैसे अंगारों पर लोट रही थी। वंदना के शरीर में सुलगती चिंगारी अब शोला का रूप लेती जा रही थी। क्या पतिव्रता धर्म सिर्फ औरत के लिए ही होता है पति का पत्नी के लिए कोई धर्म नहीं होता? जब पति-पत्नी की आवश्यकताओं की ओर ध्यान न दें तो क्या पत्नी को यह हक नहीं कि वह अपनी जरूरतों की पूर्ति कहीं और से कर ले? उसे अपने कालेज के प्रेमी अरूण के साथ बिताये दिन याद आने लगे। अतः उसने अरूण पर डोरे डालने शुरू कर दिए।

वाराणसी का कैन्ट रेलवे स्टेशन

उसने अरूण को वो लटके-झटके दिखाये कि दीवाना होकर वह दिन-रात वंदना के घर के चक्कर लगाने लगा। अरूण को पूरी तरह आधीन देखकर आखिर एक रोज वंदना ने अपनी छलकती जवानी को सोलह  शृंगारों द्वारा सजाकर घर के सामने से गुजर रहे अरूण को इशारों से अपने पास बुलाया, अरूण का कलेजा जोरों से उछला, वह तो वैसे ही वंदना का दीवाना था और आज तो सजी-धजी वंदना ने उस पर बिजलियां ही गिरा दीं। वह चाहकर भी आपने मनोभावों पर काबू नहीं रख सका, “क्या बात है भौजी आज तो कयामत ढा रही हो, यूं दरवाजे पर खड़ी होकर किसको कत्ल करने पर तुली हो।“

“झूठ-मूठ की तारीफ मत किया करो।“ वंदना ने शरमाने का जबरदस्त अभिनय किया और तिरछी चितवन से अरूण को निहारती हुई पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदनी लगी।

“मैं सच कहता हूं भौजी… तुम्हारी एक मुस्कान पर लोग जान कुर्बान करके रख दें, पता नहीं भइया कैसे तुम्हें छोड़कर दिल्ली में रह लेते हैं, उनकी जगह मैं होता तो…”

“तो क्या करते?”

“छोड़ो भौजी…”

“अरे बोलो न… उनकी जगह तुम होते तो क्या करते?”

“दिन-रात तुम्हें बांहों में दबोचे रहता, एक पल को भी खुद से अलग नहीं करता।“

“अरे-अरे… लगता है तुम तो दीवाने हो गये हो, कहीं दोस्त की बीवी पर तुम्हारी नीयत तो नहीं खराब हो गई?”

“क्या कहती हो भौजी?” अरूण हड़बड़ा सा गया।

“मैं सच कह रही हूं बहुत दिनों से देख रही हूं तुम मेरे घर के चक्कर लगाते रहते हो, मुझसे मिलने के बहाने खोजते रहते हो, बोलो क्या मैं झूठ बोल रही हूं।“

“भौजी…वो…वो…” अरूण थूक गटकता हुआ बोला, “वो क्या है कि तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो, मैं तुम्हे अभी तक नहीं भूल पाया हूं इसीलिए देखने चला आता हूं, अगर तुम्हें बुरा लगता है तो…”

“मैंने ऐसा तो नहीं कहा…” कहकर वंदना ने एक बार फिर तिरछी चितवन से उसे निहारा और बोली, “भीतर आ जाओ चाय पीकर जाना।“

अरूण हर्षित हो उठा, उसे अपनी कामनाएं पूर होती दिखाई दीं, उसने एक बार अपने दाएं-बाएं दृष्टिपात किया, कोई नहीं था, वह फौरन कमरे में प्रवेश कर गया। वंदना चाय बनाकर ले आई। दोनों ने साथ-साथ चाय पी, फिर वंदना ने जैसे ही कप उठाने के लिए हाथ बढ़ाया तो हिम्मतकर अरूण ने वंदना का हाथ थाम लिया।

“क्या कर रहे हो?” वंदना कसमसाई, “छोड़ो मुझे कोई आ जायेगा…”

पुलिस हिरासत में अभियुक्त अरूण

वंदना का बनावटी गुस्सा देख अरूण की हिम्मत बढ़ गयी और वह झटके से वंदना को अपने ऊपर गिरा उसके उभारों को सहलाना शुरू कर दिया।

जल्द ही वंदना का विरोध कम हो गया और उसने अपने बदन को अरूण की बाहों में ढीला छोड़ दिया। अब गर्दन से फिसलते हुए अरूण के हाथ वंदना के बदन का भूगोल नापने लगे। अरूण का स्पर्श वंदना को बहुत अच्छा लग रहा था।

फिर अरूण ने अपना हाथ उसके कपड़ों के भीतर डाल दिया और उसके कोमल हिस्सों को सहलाने लगा। महीनों से पुरूष समागम को तरस रही वंदना उत्तेजित हो उठी। देखते ही देखते दोनों उत्तेजना के शिखर तक जा पहुंचे, दोनों के तन से कपड़े कम होते चले गए और एक वक्त वो आया जब दोनों एक दूजे के तन में आनंद रस तलाश करने लगे।

एक बार दोनों के बीच अवैध संबंधों का सिलसिला शुरू हुआ तो आगे अक्सर मौका निकालकर इस खेल को दोहराया जाने लगा। कोई रोकने-टोकने वाला था नहीं, पति दिल्ली में था और साल में एक-दो बार ही घर आता और 2-4 दिन रूककर फिर वापस काम पर चला जाता था। आस-पास में खुसर-फुसर जरूर शुरू हुई, मगर खुलकर कोई कुछ नहीं कहता था, लिहाजा अय्याशियों का यह सिलसिला निर्बाध गति से जारी रहा।

19 मई 2013 की सुबह वाराणसी में जीआरपी कैंट थाने के प्रभारी इंसपेक्टर त्रिपुरारी पाण्डेय को कैंट रेलवे स्टेशन के माल गोदाम के पास एक अज्ञात युवक की खून से लथपथ शव पड़े होने की जानकारी मिली। जानकारी मिलते ही इंसपेक्टर श्री पाण्डेय तत्काल अपने वरिष्ठ अध्किारियों को घटना से अवगत कराते हुए दलबल सहित घटनास्थल पर पहुंच गये।

इंस्पेक्टर श्री पाण्डेय सूक्ष्मतापूर्वक लाश का निरीक्षण करने लगे- मृतक को बड़ी निर्दयतापूर्वक वार किये गये थे, चेहरा विकृत कर दिया गया था, फिर भी अनुमान लगाना आसान था कि मृतक की उम्र अभी 30 से 35 वर्ष के बीच ही रही होगी। लाश की हालत देखकर यह अनुमान लगाने में भी कठिनाई नही हुई कि उसकी हत्या बीती रात में ही किसी समय की गई होगी।

इस बीच यह खबर जंगल में लगी आग की तरह चारों ओर फैल गई थी, परिणामस्वरूप आस-पास के तमाम लोग आ जुटे और तरह-तरह की बातें करने लगे। अपने इलाके में हुए इस काण्ड से इंस्पेक्टर श्री पाण्डेय तिलमिला उठे और किसी भी तरह जल्दी-से-जल्दी हत्यारे का पता लगाने के लिए कटिबद्ध हो गये।

पुलिस हिरासत में अभियुक्त अरूण

खून-कत्ल के मामलें में जाँच आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहले मृतक की शिनाख्त होनी जरूरी होती है। मृतक पैंट-शर्ट पहने हुए था। जेबों की तलाशी लेने पर उसके पास से कुछ भी नहीं मिला। कुछ ही दूर पर बैंक की एक पर्ची मिली, खातेदार का नाम वंदना था। लेकिन वहाँ मौजूद तमाम लोगों में से कोई भी उसकी शिनाख्त नहीं कर सका। आखिर भरसक पूछताछ के बाद तात्कालिक कार्यवाही शुरू हुई। इस सिलसिले में भा0द0वि0 की धरा 302/201 के अन्तर्गत मुकदमा अपराध संख्या 102 पंजीकृत कर लिया गया। लाश का पंचायतनामा करके उसे सील-मोहर करवाने के बाद पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेजवा कर इंस्पेक्टर श्री पाण्डेय मृतक की शिनाख्त और हत्यारे का पता लगाने की दिशा में तत्परता से मुखबिरों का जाल फैला दिया।

हर तरफ दिमाग दौड़ाने के बाद भी कहीं से कोई कड़ी जुड़ती हुई नहीं प्रतीत हो रही थी अचानक थाना प्रभारी श्री पाण्डेय को घटनास्थल पर मिली बैंक की पर्ची का ध्यान आया। पर्ची में किसी वंदना नाम की महिला के खाते में पैसा जमा किया गया था। थाना प्रभारी श्री पाण्डेय ने बैंक से जांच-पड़ताल किया तो पता चला कि दिल्ली से उमाशंकर नाम के व्यक्ति ने सुल्तानपुर के लम्बुआ थानान्र्तगत समहुता कला निवासी वंदना के खाते में पैसा जमा किया था।

थाना प्रभारी श्री पाण्डेय ने खाता धरक से शव का शिनाख्त करवाने के लिए खबर भिजवायी तो अगले ही दिन वंदना के जेठ रमाशंकर वाराणसी आ गये। शव को देखते ही उन्होंने उसकी शिनाख्त अपने छोटे भाई उमाशंकर के रूप में करते हुए विलख उठे।

जीआरपी कोतवाली के प्रभारी श्री पाण्डेय ने ढांढ़स बंधते हुए कहा, “जो होना था, वह तो हो ही चुका, अब तुम्हें अपने भाई के कातिल को पकड़वाने में पुलिस की मदद करनी चाहिए! क्या उमाशंकर की किसी से दुश्मनी…”

“नहीं, साहब… मेरे भाई की किसी से दुश्मनी नहीं थी। वह तो दिल्ली में रहता था। 1-2 दिन पहले घर आने वाला था, यहां कैसे आ गया…” बोलते-बोलते एकाएक रमाशंकर  अटककर जैसे कुछ सोचने लगा तो इंसपेक्टर श्री पाण्डेय ने उतावली से पूछा, “बोलो-बोलो…. अटक क्यों गए? क्या कहना चाहते हो…”

“ऐसे ही एक बात याद आ गई, साहब….”

“क्या?”

“17 मई को उमाशंकर दिल्ली से आने वाला था, स्टेशन से उसे लेने उसका मित्रा अरूण लेने गया था।“

पूछताछ के दौरान थाना प्रभारी श्री पाण्डेय को रमाशंकर से कुछ ऐसी बात पता चली जिससे शक की सुई अरूण और वंदना पर जाकर टिक गयी। उन्होंने जब दोनों के पता किया तो दोनों घर से फरार मिले। आखिरकार पुलिस ने दोनों को हिरासत में लेने के लिए मुखबीरों का जाल फैला दिया।

22 मई 2013 को थाना प्रभारी श्री पाण्डेय को अरूण को प्लेटफार्म नम्बर 8 पर होने की जानकारी मिली तो आनन-फानन में उन्होंने दविश देकर अरूण को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया।

पूछताछ के दौरान पहले तो अरूण अपने को निर्दोश बताता रहा, लेकिन जब पुलिस ने उसकी जामा तलाशी ली तो उसके पास से उमाशंकर का मोबाइल व कपड़ा बरामद हुआ तो वह टूट गया और अपना अपराध स्वीकार कर लिया।

पूछताछ में अरूण ने बताया कि वह वंदना से बेइंतहा मोहब्बत करता है। उसको कोई और छुए यह उसे बर्दाश्त नहीं था। वह वंदना से पढ़ाई के समय से ही प्यार करता था। बीच में उसकी शादी पड़ोस में रहने वाले उसके मित्र उमाशंकर से हो गया। इसके बाद वंदना सुल्तानपुर में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी करने लगी। पास में ही वह भी रहने लगा। फिर दोनों में अवैध संबंध स्थापित हो गया। अंततः दोनों ने कभी न बिछुड़ने के लिए उमाशंकर को रास्ते से हटाने के लिए योजना बनाई और योजना को अंतिम रूप देने की फिराक में रहने लगे।

जल्द ही खबर मिली कि 17 मई को उमाशंकर दिल्ली से आ रहा है। उसे रिसीव करने मैं सुल्तानपुर स्टेशन पहुंचा। वहां से बहाना बनाकर उमाशंकर को लेकर गोरखपुर गया। फिर वहां से वाराणसी ले आया। यहां रात में ढाई बजे हम दोनों माल गोदाम की तरफ शौच के लिए गए। वहां उमाशंकर से नजर बचाकर उसके सिर पर पत्थर से वार कर दिया। कुछ ही देर में जब छटपटाकर शांत हो गया तो हत्या को दुर्घटना का रूप देने के लिए उसके शव को खीचकर रेलवे की पटरी पर ले जाने लगा कि कुछ लोगों के आने की आहट पर उसे वही छोड़कर फरार हो गया।

अरूण को अपराध स्वीकार कर लेने के बाद आवश्यक खानापूर्ती के बाद अगले दिन पुलिस ने अरूण को अदालत में प्रस्तुत कर दिया जहां से उसे न्यायिक हिरासत में जेल दिया।

बाद में पुलिस ने वंदना को भी गिरफ्तार कर उसे भी अपने पति उमाशंकर की हत्या के अरोप में भा0द0वि0 की धरा 302/201 के अन्तर्गत अदालत में प्रस्तुत दिया। जहां से उसे भी न्यायिक हिरासत में जेल दिया गया। कथा संकलित किए जाने तक अभियुक्तों की जमानत नहीं हुई थी। थाना प्रभारी जीआरपी इंस्पेक्टर त्रिपुरारी पाण्डेय विवेचना पूरी करने में जुटे थे।

(नाट्य रुपांतरित कथा पुलिस एवं मीडिय सूत्रों पर आधारित।)

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