कालगर्ल का आत्मसम्मान

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♦ स्टोरी : संतोष पाठक

रजनी अप्सराओं जैसी खूबसूरत थी, कसावदार सेक्सी बदन, रसभरे होंठ और बड़ी-बड़ी आंखें किसी को भी सहज ही उसका दीवाना बना देती थीं। वह खुद भी तो यही चाहती थी मर्दों की निगाहों में आना! यही तो उसकी कमाई का जरिया था।

रात के दस बजने को हैं, इसका अहसास रजनी को, अभी-अभी घड़ी देखने के पश्चात ही हुआ था। वक्त का अहसास होते ही न जाने क्यों एक अंजाना-सा भय धीरे से उसके दिल में उतर आया और धमनियों में बहते लहू के साथ जा मिला। दस बजना कोई नई बात नहीं है, अक्सर ऐसा हो जाया करता है, फिर भी आज वह फिक्रमंद हो उठी है। उसने धीरे-धीरे गर्दन घुमाकर अपने आस-पास का जायजा लिया। बस-स्टाप तकरीबन खाली हो चुका था, जो बचे हुए लोग दिखाई दिये, उन्हें वह अपनी उंगलियों पर गिन सकती थी।

जैसे कि…मूंगफली वाला, जलेबी वाला, पान वाला और उसके आजू-बाजू खड़े दो मर्द। कुल पांच लोग मौजूद हैं, वहां जिनके होने का उसके लिए कोई महत्व नहीं था। उन सबके बीच रहकर भी वह नितांत अकेली ही है। ऊपर से जानबूझकर सबसे अलग-थलग बने रहने की मुसीबत लड़की जो ठहरी।

ऐसे वक्त में स्वयं का लड़की होना उसे किसी भयंकर अपराध से कम नही महसूस होता। फुरसत के क्षणों में वह अक्सर सोचती है, ईश्वर ने उसे लड़की क्यों बनाया, लड़का क्यों नहीं? तब कम से कम हर वक्त उसके भीतर यह असुरक्षा की भावना तो नहीं बनी रहती। बात अगर सिर्फ इतनी होती तो गनीमत थी, किन्तु यहां तो हर तरफ एक के बाद एक मर्द, सर्प की तरह फन उठाये, दंश मारने को एकदम से तैयार मिलते हैं। क्या-क्या नहीं बर्दाश्त करना पड़ता है उसे, कहीं अपनी गर्दन पर महसूसती उनकी गर्म सांसों की फुंफकार, तो कहीं शरीर पर चुभती उनकी तेज धारदार निगाहें, कपड़ों के भीतर तक एक्सरे करती हुई सी…भला इनसे भी बचा जा सकता है?

अब इन्हीं दो हरामजादों को देखो, आजू-बाजू यूं तन कर खड़े हैं, जैसे दोनों उसके ‘बाडीगार्ड’ हों। ऊपर से धीरे-धीरे अपनी तरफ फिसलती उनकी टांगों का अहसास! वह बेखबर नहीं है, सब कुछ समझ रही है वह, रग-रग से वाकिफ है वह इन पुरुषों की, जो मन ही मन उसे हजम कर जाना चाहते हैं…या फिर कर भी चुके और जता यूं रहे हैं जैसे कोई मतलब ही नहीं हां उससे। मानो सब-कुछ अनजाने में ही होता चला जा रहा है। ये लोग मांस खाना तो चाहते हैं, किन्तु हड्डियों को गले में लटकाकर घूमने की कुव्वत उनमें नहीं है। वे नहीं चाहते की कोई उन्हें मांसाहारी समझे, रजनी उन दोनों से ही दूर हो जाना चाहती है, किन्तु क्या करें, एकांत का सामना करने की हिम्मत उसमें नहीं है बस, कभी-कभार जब उन दोनों का सामीप्य बर्दाश्त से बाहर होने लगता है, तो आगे-पीछे सरक कर स्वयं को उनसे दूर रखने की कोशिश भर कर लेती है।

किन्तु सब व्यर्थ साबित हो रहा है, अगले ही पल दोनों ने पुनः अपने स्थान से सरकना शुरू कर दिया और उसके एकदम करीब पहुंच गये। रजनी ने निगाहों से ऐतराज जताने की कोशिश की। बारी-बारी से उन दोनों को घूरकर देखा। एक पल को दोनों उधर से अपनी निगाहें फेरकर तनिक सिमट से गये, किंतु उसकी निगाह हटते ही फनः पुराना सिलसिला चल निकला। गुजरते वक्त के साथ रजनी की परेशानी बढ़ने लगी, वह कुछ अधिक नर्वस हो उठी। घड़ी देखने पर ज्ञात हुआ कि साढ़े दस बज चुके हैं। वह अपनी जगह से हटकर तनिक आगे बढ़ी दूर-दूर तक सड़क पर निगाह दौड़ाकर देखने की कोशिश की, निराशा ही हाथ लगी, बस का कहीं पता नहीं था। पिछले एक घंटे से यहां खड़ी वह अपनी बस का इंतजार कर रही है, आॅटो से भी जा सकती है, किन्तु बस के साथ-साथ मानो आॅटो वालों  ने भी हड़ताल कर दिया हो, वह कर भी क्या सकती है? बस इंतजार किये जा रही है।

ऐसे वक्त में अचानक बज उठे मोबाइल फोन की घंटी सुनकर उसे तनिक राहत-सी महसूस हुई, बैग में हाथ डालकर उसने फोन बाहर निकाला और बातें करने लगी। ‘‘हाॅय’’ उधर से कहा गया, ‘‘कहां हो जानेमन, क्या इस दीवाने को मार डालने का इरादा है, जल्दी आओ ना सारा नशा उतरा जा रहा है। मैं बेकरार हूं तुम्हारे भारी कूल्हों को थपथपाने के लिए…।’’ फोनकर्ता इससे पहले की शराब के नशे में कुछ और कहता रजनी ने ‘बस आधा घंटा और’ कहकर काल डिस्कनैक्ट कर दिया। रजनी ने फोन पुनः बैग में रख लिया और इंतजार करने लगी।

दरियागंज के बस स्टाप पर रुकने के बाद बस, अभी-अभी आगे बढ़ी थी। अनायास ही रजनी की निगाह खिड़की से बाहर झांकती हुई, अगले दरवाजे तक पहुंच गई। एक नवयुवक बड़ी ही तेज गति से बस के साथ-साथ दौड़ रहा था, मानो यह उसके जीवन की आखिरी बस हो। वह बार-बार बस के भीतर दाखिल होने की कोशिश कर रहा था, एक पल को लगा बस उसके हाथ से छूट चुकी है। किन्तु वह हार मानने को तैयार नहीं था। दौड़ता रहा, दौड़ता रहा और अंततः वह मानो हवा में उड़ता हुआ-सा बस के भीतर दाखिल हो गया।

‘अबे , बहन चो….मरेगा क्या?’

यह खूबसूरत-सा वाक्य निश्चय ही ड्राइवर के मुख से निकला था। मालूम नहीं, वह किस बात पर क्रोधित है, युवक द्वारा बस की स्पीड को धता बताने पर या फिर वह सचमुच उसके लिए फिक्रमंद था। गाली देने के पश्चात वह पुनः अपनी ड्राइविंग में खो गया, मुड़कर अपने शब्दबाण का असर तक देखने की कोशिश नहीं की। युवक ने भी जवाब में कुछ नहीं कहा, वह बस की छत में लगे लोहे के डण्डे को पकड़कर झूलता हुआ आगे बढ़ा और रजनी के बगल में धम्म से बैठ गया।

इस प्रक्रिया में उसकी कोहनियां रजनी की छातियों को सहला गई, हाथ, उसकी जांघों पर दबाव बना गए। रजनी को तनिक असुविधा-सी महसूस हुई। किन्तु वह मुंह से कुछ नहीं बोली…आदत-सी पड़ गई है उसे इस तरह धक्के खाने की, फिर सोचती है, अब बचा ही क्या है उसके पास सहेज कर रखने के लिए, वक्त से बहुत पहले ही तो गंवा चुकी है वह अपना सब कुछ…अब तो आत्मसम्मान, सतीत्व इत्यादि के विषय में सोचना भी भारी मजाक का विषय जान पड़ता है। वह यकीन पूर्वक कह सकती है कि उसके बगल में बैठा युवक जान-बूझकर हड़बड़ी जताता हुआ वहां आ बैठा था, वह सिर्फ उसे स्पर्श करना चाहता था, कर चुका था।

‘ऊंह, हरामजादा…स्साला।‘

युवक ने हड़बड़ाकर उसकी तरफ देखा, वह अचम्भित है, यकीन नहीं कर पा रहा है कि उसके बगल में मौजूद इस खूबसूरत रमणी ने उसे गाली दी है।

‘आपने मुझसे कुछ कहा?‘ वह स्वयं को प्रश्न करने से नहीं रोक पाया।

‘जी नहीं।‘ कहकर रजनी ने मुंह फेर लिया और खिड़की से बाहर फैंसी रंग-बिरंगी रोशनियों में स्वयं को उलझाने का प्रयत्न करने लगी, मगर इस दौरान उसका पूरा ध्यान युवक के इर्द-गिर्द ही मंडराता रहां वह चाहकर भी उसके ख्यालों को दिमाग से खुरच नहीं पा रही थी। उसे बार-बार महसूस हो रहा था जैसे वह युवक  उस पर हंस रहा हो और उसकी खामोश निगाहें रजनी के शरीर को टटोलने का प्रयत्न कर रही हो। क्या सचमुच ऐसा ही था, या फिर यह एक नया भ्रम है। जिसने उसके भीतर का दरवाजा खोज लिया है और अब उस बंद दरवाजे पर दस्तक देने की कोशिश कर रहा है। वह परेशान हो उठी।

अचानक उसे लगा बगल में बैठा युवक उसके खुले गले से झांकते उरोजों को घूर रहा है, वह एकदम से युवक की ओर पलट गई मगर वह दूसरी ओर देख रहा था। अचानक ही उसे अपने चारों तरफ, माहौल कुछ बदला-बदला-सा प्रतीत होने लगा। भीतर कहीं एक अनजाना-सा अहसास रह-रहकर करवटें बदलने लगा। जाने यह सब क्या है, क्यों हो रहा है? वह जानने की कोशिश करने लगी ढूंढने लगी, उस नयेपन के अहसास को, रास्ते में छिटकी पड़ी चांदनी और लैम्प पोस्ट की रोशनी में। हर जगह, हर तरफ, किन्तु जो भी दिखाई दिया वह सामान्य ही लगा, बिल्कुल पहले जैसा। उसका दिल इसे स्वीकारने को तैयार नहीं था, कुछ तो होना ही चाहिए…वह जो अब अपना स्वरूप त्याग चुका है, जिसके होने का अहसास उसे अपने चारों तरफ फैला हुआ महसूस हो रहा है। रजनी की परेशानी बढ़ने लगी। उसने आगे-पीछे, बस के अन्दर, बस के बाहर हर तरफ तलाश करके देख लिया…सबकुछ सामान्य ही दिखाई दिया। फिर क्यों उसका दिल यूं बार-बार किसी असामान्यता के घेरे में कसता चला जा रहा है?

रजनी इस बारे में जितना अधिक सोच रही है, उतना ही उलझती जा रही थी। उसने एक के बाद दूसरी, तीसरी…कई कोशिशें कर डालीं, खुद को उस असामान्यता के घेरे से बाहर निकालने की, किन्तु सफल नहीं हो सकी। हार मानकर वह शांत बैठ गई, उसने अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया। किन्तु मन ज्यों का त्यों भटकता रहा। निगाहों को साथ लिए वह जाने कहां-कहां फिरता रहा। यूं भटकती उसकी निगाह जब अपने सहयात्राी पर पड़ी, तो वह चैंक उठी…उसके बगल में बैठा युवक सीट की दूसरे किनारे की हदों को पार करता हुआ अपने आप में सिमट-सा गया था। मानो रजनी कोई छूत की बीमारी हो, जिसके स्पर्श से वह बचना चाहता है। मानो, वह कोई आम लड़की हो, जिस पर ध्यान देना उसने गैरजरूरी समझा था। आज से पहले उसके साथ कभी ऐसा नहीं हुआ था। क्या बच्चे, क्या जवान और क्या बूढ़े सभी उसका सामीप्य पाने को आकुल दिखाई देते थे, दूर खड़े लोग एक-दूसरे को धकियाते हुए उसके करीब पहुंचने की चेष्टा करते थे और अगर उसके बगल में कोई नवयुवक बैठा हो, फिर तो हर मोड़ पर रजनी को उसके शरीर का भार झेलना पड़ता था। अब उसे यह सब बुरा नहीं लगता था…वह भीतर तक आनंदित हो उठती थी, श्रेष्ठता के अभिमान में उसका चेहरा जगमगा उठता था, मानो, उसने कोई मैडल जीत लिया हो।

वह थी ही खूबसूरती की हदों को पार करती हुई सी, एक बार जो उसे देख लेता बस…कभी-कभी तो उसे स्वयं भी रश्क हो आता, अनजान नहीं थी वह खुद से। किन्तु आज सब कुछ बदल-सा गया है, उसके बगल में बैठा यह अनजान युवक उसमें तनिक भी दिलचस्पी नहीं ले रहा। रजनी को लगा सारी असामान्यता यहीं है, जो कि बेवजह उसके भीतर कसमसाहट उत्पन्न कर रही थी। उसने चोर निगाहों से युवक की तरफ देखा, सूरत से वह निहायती शरीफ नजर आया, पढ़ा-लिखा भी मालूम हुआ, फिर इतनी बेरुखी? रजनी सोच में पड़ गई। क्या सचमुच ऐसा हो सकता है कि वह उससे जरा-भी प्रभावित नहीं हुआ हो। सोचते वक्त अनजाने में ही उसकी निगाह सामने के शीशे पर जा पड़ी और वहीं थमकर रह गई। शीशे में अपना अक्स देखकर वह पहले की भांति प्रफुल्लित नहीं हो सकी, कुछ बुझ-सी गईं उसे लगा यह चेहरा तो उसका है ही नहीं, यह तो कोई अजनबी सूरत है, जो ठीक से पहचानी भी नहीं जाती। देखते ही देखते उसके केश बिखर से गये, गालों पर झुर्रियां उभर आईं और उसकी खूबसूरत बड़ी-बड़ी आंखें अंदर को धंस गई प्रतीत होने लगी, वह भयभीत हो उठी, उसका दिल कर रहा है कि वह चीख-चीखकर सबको बता दे कि यह वो नहीं है, यह चेहरा जो दिखाई दे रहा है, यह उसका नहीं है।

चिल्लाने की कोशिश में वह पसीने से तर हो गई, भयभीत होकर उसने अपनी निगाहें फेर लीं और धीरे-धीरे पुनः अपना ध्यान युवक पर केन्द्रित करने लगी, किन्तु यहां भी उसको सकून नहीं मिल रहा, युवक का बर्ताव बार-बार उसके भीतर चुभन-सी पैदा कर रहा है। रजनी को यह सरासर अपनी तौहीन दिखाई दे रही है, उसका अहम इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहा कि वह युवक उसकी तरफ से उदासीन बना बैठा रहे, प्रति पल उसके भीतर की कसमसाहट बढ़ती जा रही है, युवक को झुकाने की कोशिश में वह स्वयं झुकती चली गई। वो युवक से बातें करने को उतावली हो उठी, किसी अजनबी से बात करने में तनिक झिझक तो अवश्य महसूस हुई, किन्तु वह खामोश नहीं रह सकी।

‘एक्सक्यूज मी!‘ उसने हौले से कहा, आवाज गले में फंसती हुई महसूस हुई।

आवाज सुनकर वह रजनी की दिशा में घूम-सा गया, ‘यस प्लीज।‘

‘जी…जी, वो…दरअसल।‘ वह हड़बड़ा-सी गई, क्या कहे, क्या पूछे? अचानक कुछ खास न सूझ सका तो टाईम ही पूछ लिया।

‘पौने ग्यारह!‘ जवाब देकर वह पुनः पहले वाली स्थिति में पहुंच गया। रजनी लाचार हो उठी। धीरे से पहलू बदलकर उसने अपना मुख खिड़की की तरफ घुमा लिया और पुनः कोशिश करने लगी, उसी युवक को अपने ख्वाबों से खुरच देने की। किन्तु यह कोशिश हार के करीब पहुंचने पर उत्पन्न हुई, जीत की प्रबल आकांक्षा के समान थी। धीरे-धीरे उसकी कल्पनाशीलता बढ़ने लगी। उसने युवक को अपने भीतर बिठाकर तमाम खिड़की-दरवाजों को मजबूती से बंद कर लिया। फिर शुरू किया सपने बुनने का एक लम्बा सिलसिला! जिसमें तरह-तरह के सुखद स्वप्न उसके सामने उपस्थित थे, जिन्हें वह मनमाने ढंग से बना-बिगाड़ सकती थी, यहां वह अपनी मर्जी की मालिक है। सपने में वह युवक उसके होंठों को चूम रहा था और वह उसे बार-बार पीछे धकेल देती थी। युवक गिड़गिड़ा रहा था उसके जिस्म को पाने के लिए मिन्नतें कर रहा था और वह उसे दुत्कार रही थी।

आखिर युवक ने उसके आगे हाथ जोड़ दिए और गिड़गिड़ाता और बोला, ‘‘ऐ हुस्नपरी मुझे अपना गुलाम समझ और अपने हुस्न की सेवा करने का मौका दो।’’

रजनी अपने ख्वाब को लगातार मनमाना रूप दिए जा रही थी, उसका ख्वाब जारी था, युवक उसका हुक्म बजा रहा था। रजनी जल्दी ही कामुक सीत्कारें भरने लगी। मारे उत्तेजना के उसने युवक को कसकर अपनी बांहों में भीच लिया…।

तभी बस ने तेज झटका खाया। रजनी का सिर आगे वाली सीट के पुश्त से टकराया और उसका हसीन ख्वाब छिन्न-भिन्न हो गया।

 ख्वाबों के घेरे से बाहर निकलकर वह विनम्र हो उठी…युवक के बारे में उसकी राय तब्दील होने लगी। कुछ समय पूर्व जो निष्ठुरता उसके अहम पर चोट कर रही थी। अब अचानक ही वह भली लगने लगी…रजनी मजबूर हो उठी, फिर एक नये सिरे से उसके बारे में सोचने लगी, ‘ओह कितना शरीफ है, बेचारा! आजकल भला इतने सीधे-सादे लोग मिलते ही कहां हैं, खासतौर से हम लड़कियों के मामले में, सभी की फितरत एक होती है। उनका दृष्टिकोण एक होता है, सोचने-समझने का नजरिया एक होता है और उन सबकी हरकतें भी एक जैसी होती हैं, किन्तु यह…यह तो सबसे अलग है, जैसे फुरसत ही नहीं है किसी और के बारे में सोचने की।‘

रजनी जाने कब मुग्ध हो उठी, उसके इस भोलेपन पर।

पहली बार उसके दिल के किसी कोने में झनकार उठी है, पहली बार उसने अपनी संकीर्ण मानसिकता के घेरे से बाहर निकलकर कुछ अलग सोचा है। महसूस किया है उन कोमल अनुभूतियों को जिनसे आज तक वह अनजान ही रही थी। उसका मन युवक की तरफ खिंचा-सा जा रहा है। वह उससे ढेरों बातें करना चाहती है, घनिष्ठता बढ़ाना चाहती है। यह मानव मन की एक दुर्बलता ही है…जो चीज हमसे जितना अधिक दूर होती है, उतनी ही आकर्षक दिखाई देती है और हम उसके उतने ही ज्यादा करीब पहुंचने की कोशिश करते हैं।

युवक की उदासीनता भी रजनी को बार-बार अपनी तरफ खींच रही है और वह सम्मोहित-सी खिंचती चली जा रही है। वह बार-बार युवक से बातें करने की कोशिश कर रही है और हर बार कुछ कह पाने से पूर्व ही खामोश हो जाती है, किन्तु वह हार मानने को कदापि तैयार नहीं है। एक के बाद एक…ऐसी कई कोशिशों के बाद आखिर वह बोल ही पड़ी।

‘सुनिये।‘

युवक तकाल उसकी दिशा में पलट गया, ‘आपने मुझसे कहा।‘

‘जी हां, दरअसल…मैं, एकच्युली में…आप?‘ वह हड़बड़ाकर चुप हो गई, जो कहना चाहती थी वह बात जुबान पर नहीं आ सकी। स्त्राीओचित लज्जा ने कुछ बोल पाने से पूर्व ही उसे खामोश कर दिया, युवक असमंजस में पड़ गया, किन्तु बोला कुछ नहीं, बस! पहले की भांति ही मुंह फेरकर बैठ गया।

रजनी पुनः तलाशने लगी, कुछ नये किन्तु ऐसे प्रश्न जिनके जरिये वह उस युवक से बातें कर सके, उसके बारे में जान सके, अंदाजा लगा सके, अपनी सोचों के अनुरूप और अभिव्यक्ति कर सके अपने विचारों की, क्या वह युवक से उसका नाम पूछे? …यह उचित होगा, अगर वह बुरा मान गया तो…शायद नहीं, फिर इसमें बुरा मानने वाली बात ही क्या है?

‘एक्सक्यूज मी!‘

‘आं…हां…कहिए।‘ वह मानो नींद से जागा हो।

‘क्या, मैं आपको नाम जान सकती हूं?‘

‘जी…आशीष…आशीष कुमार।‘ वह बेहिचक बोला। रजनी की प्रसन्नता का अनुमान न रहा। वह इतरा उठी अपनी विजय पर…इतना ज्यादा कि एक के बाद दूसरा प्रश्न करने में संकोच का अनुभव न हुआ।

‘आप जाॅब करते हैं…शायद।‘

‘जी हां, यहीं एक प्राइवेट फर्म में एकाउंट मैनेजर हूं, माफ कीजिए, किन्तु आपने अपने बारे में कुछ नहीं बताया।‘

‘मैं!‘ वो इठला उठी, ‘रजनी श्रीवास्तव।‘

‘स्टूडेंट हैं आप…।‘

‘जी नहीं।‘

‘तो फिर जाॅब करती होंगी…।‘

‘अब तो शायद वो भी नहीं करती, कुछ देर पूर्व ही न जाने क्यों सब कुछ बदल-सा गया! कल तक जो कुछ भी मेरा अपना था, मेरे जीवन का अवलम्ब था, आज अचानक ही महत्वहीन हो उठा है, यूं महसूस हो रहा है, जैसे मैंने जिन्दगी को पहचानने में बड़ी भूल की है, अब तक तो मैं सिर्फ खोती ही चली आई हूं, पाया कुछ भी नहीं। बस, समझते की कोशिश में लगी हूं कि इतना सब कुछ यूं पलक झपकते ही केसे घटित हो गया?‘

‘कुछ समझ में आया?‘

‘नहीं, बस! उलझ-सी गई हूं।‘

‘सूरत से तो ऐसी नहीं दिखती आप।‘

‘माफ कीजिए आशीष मैं आपका मंतव्य नहीं सझ सकी।‘

‘दरअसल आपको देखकर लगता है, बस इतना ही पर्याप्त है आपके बारे में सब कुछ जान लेने के लिए। किन्तु मेरा अंदाजा गलत था, आप तो बेहद गहरी हैं…कई परतों से मिलकर बनी हैं और हर परत अपने-आप में सम्पूर्णता का अहसास कराती है। आपके पहलू में बैठते वक्त लगा था, आप महज एक खूबसूरत लड़की हैं। आपने बोलना शुरू किया, तो लगा काॅफी वाचाल हैं आपकी बातें सुनकर लगा, आप बेहद दुःखी हैं और अब मैं सोचने को विवश हो गया हूं कि आप कोई लेखिका या शायरा तो नहीं हैं।‘

रात के बारह बजने को हैं, किन्तु नींद रजनी की आंखों से कोसों दूर है। वह आशीष के साथ बिताये गये एक-एक क्षण, एक-एक बात को, कई-कई बार मन ही मन दोहरा चुकी है और अब उनका विश्लेषण करके अपनी सोचों के अनुरूप नये-नये अर्थ तलाशने की कोशिश कर रही है। ऐसी हर कोशिश उसे आशीष की तरफ खींचती चली जा रही है। उसे महसूस हो रहा है कि वह आशीष से मोहब्बत कर बैठी है। ‘मोहब्बत’ एक नई अनुभूति थी उसके लिए। अब तक वह सिर्फ सेक्स को ही प्रेम समझती आई है, किन्तु आज ऐसा नहीं है…आज प्रेम का एक नया अर्थ, नया रूप उभर कर उसके सामने आ रहा है।

मन के विचार बार-बार करवट बदल रहे हैं, उसी अनुपात में उसके अंतर्मन की उलझन गहराती जा रही है। किसी एक रास्ते को वह पूर्ण नहीं मान पा रही है…लग रहा है कोई भी राह अपने आपमें पूर्ण नहीं हेाती, कहीं न कहीं उसे दूसरे किसी रास्ते में समाहित होना ही पड़ता है, फिर वे दोनों एकाकार होकर किसी तीसरे रास्ते से जा मिलते हैं। बस, इसी तरह रास्ते बनते चले जाते हैं। वह इनसे अलग हटकर चलना चाहती है, किन्तु किसी नये राह के निर्माण की क्षमता उसमें नहीं है, फिर! कितना आसान होता है किसी बने-बनाये रास्ते पर नाक की सीध में आगे बढ़ते चले जाना और कितना मुश्किल होता है नई राह का निर्माण…हर कदम पर फिसल जाने का खतरा, कहीं चट्टानों से टकराने का भय, तो कहीं किसी गहरे अंधड़ में गिर पड़ने की आशंका।

वह जाने क्या-क्या सोचती रही, अंततः अपनी ही भयावह सोचों से भयभीत हो, वह चिल्ला कर उठ बैठी, मानो अभी-अभी नींद से जागी हो, उसे अपना समूचा अस्तित्व सागर की अन्नत गहराइयों में विलीन होता-सा प्रतीत हो रहा है।

ओह! जाने क्या-क्या सोचती रहती वह…पहले भी तो उसने ऐसे ही किसी नये रास्ते के निर्माण की कोशिश की थी, नतीजा क्या हुआ एक बार जो पांव फिसला तो जीवनभर फिसलती ही चली गई। लीक से अलग हटकर चलने की कोशिश मे वह परत दर परत के गर्त में समाती चली गई और आज वह महज एक काॅलगर्ल बनकर रह गई है। अपनी स्वेच्छा से ही तो चुना था, उसने यह ‘धंधा’ न कि किसी ने मजबूर किया था, जैसा कि इस दो़ करोड़ की आबादी वाले महानगर में अक्सर होता ही रहता है।

वह करती भी क्या? आठ हजार रुपये की माहवारी पगार में पेट तो शायद भर जाता, किन्तु उसकी ऊंची महत्वाकांक्षाएं, जिनके लिए वह सत्रह साल की उम्र की उम्र में भागकर दिल्ली चली आई थी…उनका क्या होता? बस, लोगों को अपने ऊपर आशिक करवाना उसका शगल बन गया और शरीर बेचना रोजगार।

उसे याद है अपना पहला ग्राहक जो उसी फर्म में मैनेजर था जहां उसने क्लर्क की नौकरी पकड़ी थी। इस काम का कोई तजुर्बा नहीं था मगर जब उसे अप्वाइंट कर लिया गया तो वह हैरान रह गयी। उसे नौकरी क्यों मिली इसका पता उसे तीसरे रोज चला था जब छुट्टी के समय मैनेजर ने उसे अपने कमरे में बुलाया। सारा स्टाफ जा चुका था। मैनेजर ने उठकर उसका स्वागत किया और स्पष्ट लहजे में कहा, ‘‘तुम्हें ये नौकरी इसलिए मिली क्योंकि तुम बहुत हसीन हो। तुम्हारी पगार आठ हजार है पर तुम अगर मुझे खुश कर दो तो पांच हजार का बोनस अभी मैं तुम्हें दूंगा।’’ कहकर मैनेजर ने 500 के दस नोट सामने रख दिए, ‘‘फैसला तुम्हारा है, तुम सिर्फ नौकरी करना चाहती हो या बोनस भी पाना चाहती हो।’’

रजनी की बोलती बंद हो गई। मगर वह ज्यादा देर तक असमंजस की स्थिति में नहीं रही, उसने सामने पड़़े नोट अपने पर्श में रखे और उठकर स्वयं ही कमरे का दरवाजा भीतर से बंद कर दिया।

मैनेजर की बांछें खिल गई। वह 40 के पेटे में पहुंचा दो बच्चों का बाप था। मगर रजनी पर यूं झपका मानों पहली बार किसी जवान खूबसूरत लड़की को देखा हो ।

रजनी के हलक से एक मर्मातक चीख निकली मगर कमरा साउंड प्रूफ था। उसकी चीख कमरे में ही गूंजती रही और मैनेजर ने अपनी मनमानी कर डाली। इससे पूर्व की मैनेजर को वह भला बुरा कहती, मैनेजर ने चुपचाप दो हजार रुपये और उसे पकड़ा दिया।

दो घंटो में सात हजार की कमाई। रजनी सारा दर्द भूल गई। इसके बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज क्या नहीं है उसके पास, सब कुछ तो पा लिया था उसने।

कल तक वह सम्पूर्ण थी, संतुष्ट थी, किन्तु आज अचानक ही सब कुछ खाली-खाली-सा महसूस होने लगा है, आज पहली बार उसे अपनी अंतरआत्मा की आवाज सुनाई पड़ी है, जो उसे बार-बार धिक्कार रही है, उसके चरित्र पर लानत भेज रही है। गुजरा हुआ वक्त किसी भयानक ख्वाब की तरह उसे बार-बार उसकी तुच्छता का अहसास करा रहा है। ऊफ! क्या-क्या करती रही है, वह अब तक, हर रात एक नया मर्द, नई गंध, नया तर्जुबा। वह इतना ज्यादा गिर गई और आज से पहले अहसास तक नहीं हुआ, उसका जी मिचलाने लगा, उठकर बाथरूम की तरफ दौड़ी। खाया-पिया सब बाहर, किन्तु तसल्ली नहीं हुई….मंुह में उंगली डालकर जबरन और उल्टियां की, फिर निर्वस्त्र होकर ‘शावर’ के नीचे खड़ी हो गई, कोशिश करने लगी, रगड़-रगड़कर स्वयं को साफ करने की, इस कोशिश में उसने अपने हर उस अंग को रगड़-रगड़कर घोया जहां से अंजान, अय्याश मर्दों की गंदगी से उठती बू उसे महसूस हो रही थी। मगर जो गंदगी भीतर तक गहरी पैठ बना चुकी थी, वह भला यूं कैसे धुल जाती।

‘हे भगवान…मुझे क्षमा करना।‘ वह हिचक-हिचक कर रोने लगी, जितना रोई, रोने की भावना उतना ही प्रबल होती गई।

इस वक्त उसकी दशा उस जुआरी की भांति हो रही है, जो जुए में अपना सर्वस्व हार चुकने के बाद स्वयं को जी भरकर कोसना शुरू कर देता है। वह भी जाने कब तक खुद को कोसती रही, गालियां देती रही, मन का उद्वेग फिर  भी शांत नहीं हुआ…बेडरूम में पहुंचकर भीगे बदन ही बिस्तर पर पसर गई। आंखों के समक्ष पुनः आशीष का चेहरा नाच उठा, उससे पुनः मिलने की चाह हर पल बढ़ती जा रही है। इस गहरे अंतद्र्वंद में रात कब बीत गई, कब सवेरा हो गया? यह रजनी नहीं जान सकी।

बस स्टाॅप पर खड़े-खड़े तकरीबन एक घंटा गुजर चुका था, अभी जाने कितना लम्बा खिंचना था यह इंतजार का सिलसिला, किन्तु आज वह मायूस नहीं हो रही, बल्कि उत्सुक है, आशीष से मिलने को। सारी बातें पहले से तय कर चुकी है। एक-एक वाक्य बहुत सोच-समझकर चुना है उसने, बस एक बार वह दिखाई दे जाये…उसकी उत्सुकता हर पल बढ़ती जा रही है, पिछले पांच मिनट में वह दस बार घड़ी देख चुकी है, किन्तु वक्त था कि बीतने का नाम ही नहीं ले रहा। सेकेण्ड की सुई मानो घंटे के हिसाब से चलने लगी हो, एक-एक पल एक-एक युग के समान महसूस हो रहा है।

‘अगर वह नहीं आया तो?‘ सोचने मात्र से वह भीतर तक हिल उठी, लगा कोई प्राण खींचे ले जा रहा हो।

‘आयेगा क्यों नहीं?‘ खुद को तसल्ली देने लगी,  ‘बस, तो पकड़नी ही है उसे..अभी तो कल वाला वक्त भी नहीं गुजरा, मैं तो बस…खामखाह परेशान हो रही हूं?‘

यूं ही सिलसिला चलता रहा।

इंतजार करते-करते वह थक-सी गई, कल वाला वक्त भी पीछे छूट गया। मगर वह नहीं आया। गुजरते लम्हों के साथ उसकी उदासी बढ़ने लगी, आशा का स्थान निराशा ने ले लिया। अपने दिल के भीतर बार-बार उसे कुछ चटकता-सा प्रतीत होने लगा, एक-एक करके सारे स्वप्न महल धराशाही होने लगे। फिर भी अवाक-सी खड़ी वह टकटकी लगाये उसके आने की राह देख रही थी। किन्तु वह नहीं आया। जो कभी उसका था ही नहीं, उसे खोने के गम में रजनी की आंखें छलक आईं…वहीं खड़े-खड़े वह रो पड़ी, जाने कब तक रोती रही।

ध्यान उस वक्त भंग हुआ, जब अचानक ही उसका मोबाइल फोन बज उठा। घंटी की आवाज सुनकर उसके आंसू थम से गये, कुछ क्षण इंतजार करती रही…किन्तु जब घंटी बजनी बंद नहीं हुई तो उसने ‘काल अटैण्ड’ कर ली और बिना कुछ कहे दूसरी तरफ से आती आवाज को सुनती रही। इस दौरान उसके चेहरे का तनाव बढ़ने

लगा…आंखें सुलग उठी। कोई कह रहा था, ‘‘अरे रानी कितनी देर लगाओगी, मेरा मन बेकरार हो रहा है।’’

‘साॅरी मैं नहीं आ सकती।‘ वो खुद को जब्त करके बोली।

‘……………………………………..‘

‘बकवास मत करो।‘ वह चीख-सी पड़ी, ‘मैं तुम्हारी रखैल नहीं हूं, जो तुम्हारे इशारों पर नाचती फिरूं।‘

‘……………………………………….‘

‘अगर तुम पैसा देते हो तो बदले में जानवरों की तरह रात भर रौंदते हो मुझे।‘

‘………………………………………..‘

‘शटअप! आइंदा मुझे फोन मत करना।‘

कहकर उसने ‘काॅल डिस्कनैक्ट’ कर दी। उसका यह फोन भी अद्भुत चीज है…उसका हमसफर…उसके हर गुनाह में शरीक कोई नहीं जानता वह कहां रहती है। बस, यह फोन ही था जो दूसरों को उससे जोड़ता था।

फोनकर्ता उसका ‘रेग्यूलर कस्टमर’ था, जो कि गैर-सरकारी बैंक में उच्च अधिकारी था, किन्तु अब उसे किसी की परवाह नहीं है, आज रजनी अपने अतीत से नाता तोड़ आई थी… उधर मुड़कर देखने मात्र से उसे दहशत होने लगी है। वह अपने अतीत को भुला देना चाहती थी, जिसके प्रथम प्रयास स्वरूप उसने मोबाइल फोन का बैटरी वाला हिस्सा खोलकर ‘सिम कार्ड’ बाहर निकाला और तोड़कर एक तरफ पड़े कूड़े के ढेर में उछाल दिया।

‘न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।‘

उसने हाथ देकर एक आटो रुकवाया और उसमें सवार हो गई।

!! समाप्त !!

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