कृषि एवं विज्ञान के उन्नायक हैं भगवान परशुराम

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– रिपोर्ट : सलिल पांडेय

मीरजापुर : पुरुष और प्रकृति के एकीकरण, समन्वय, तादाम्य का महीना है वैशाख। इस महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि त्रिगुणात्मक जीवन की ज्ञान-इच्छा एवं क्रियाशक्ति का भान कराने वाली तिथि है। इसके अलावा यह तीनों लोक भू: भुव: स्व: को भी ऊर्जावान करने की तिथि है। इस तिथि को अक्षय तृतीया का निर्धारण करने के केवल आध्यात्मिक कारण ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक कारण भी है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह सत्ययुग की प्रारम्भ तिथि है। सत्ययुग के ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश का स्वरूप अक्षय एवं अविनाशी है। पूरी सृष्टि सृजन, पालन एवं विनाश की त्रिकोणात्मक परिक्रमा करती है। यह तिथि ज्ञान एवं क्रिया के देवता परशुराम का अवतरण दिवस भी है। ऋषि होने के नाते परशुराम जी जहाँ ज्ञान के देवता होते हैं, वहीं प्रजा हित एवं सकुशल राज्य-सन्चालन के लिए निर्धारित मानकों के विपरीत कार्य करने वाले राजाओं से अनेकानेक बार संघर्ष की भी कथाएं उल्लिखित हैं।

वैशाख ऋतुराज वसन्त के उन्मेष का महीना है। चैत्र शुक्ल पक्ष से शुरू वसन्त 2 माह अपना जो सुमधुर प्रभाव छोड़ता है, उससे त्रेतायुग के अक्षय स्वरूप के भगवान विष्णु के सप्तम अवतार भगवान श्रीराम एवं अष्टम अवतार योगेश्वर कृष्ण अभिभूत होते हैं। वनवास के दौरान भगवान श्रीराम के सीताहरण के पश्चात भटकाव एवं व्यग्रता को विराम देने वाला यही समय है। दण्डकारण्य में प्रथमतः ज्ञान और विज्ञान के केंद्र श्रीहनुमान से उनकी इसी समय मुलाकात होती है। श्रीराम को हनुमान की बातो में ऋकवेद, यजुर्वेद तथा सामवेद के ज्ञान का आभास होता है। ज्ञानी हनुमान को पाकर वे सीता को पाने के प्रति आश्वस्त होते दिखाई पड़ते है। वसन्त ऋतु का समय है। वाल्मीकि रामायण में भगवान राम द्वारा वसन्त ऋतु का जो वर्णन किया गया है। वह पुरुष और प्रकृति के बीच समन्वय स्थापित करने का संकेत स्पष्ट रूप से देता है। शीतकाल की समाप्ति के बाद सूर्य की रश्मियों में आती तेजी का रूप सुहावना है। पुरुष के इस सुहावने पन पर प्रकृति मुग्ध होने लगती है। धरती-आकाश की आपसी अनुकूलता से पुरानापन नवीन होता है। प्रकृति के इस भाव को जीवन में आत्मसात करने का सन्देश भी निहित है।

श्रीराम कृष्ण बनकर द्वापर के अगले अवतार में वसन्त की मोहकता को भूलते नहीं और ‘मासानां मार्गशीर्षोSहम ऋतुनां कुसुमाकर:’ कह कर वसन्त को अपना स्वरूप ही प्रदान कर देते है। लिहाजा श्रीराम एवं श्रीकृष्ण की कृपा-अनुकम्पा से अभिसिक्त होने का यह समय है। दोनों अवतारी पुरुष का जीवन सिर्फ सैद्धांतिक ही नहीं बल्कि क्रियात्मक भी था। वसन्त ऋतु के इसी काल में वैशाख तृतीया को अवतरित दशावतार में छठे एवं 24 अवतारों में 16वें भगवान परशुराम की महिमा से यह भी सन्देश मिलता है कि जीवन के षटचक्रों का भेदन करते हुए सहस्रार की ओर बढ़ने से चिंतन राम-कृष्ण की तरह उर्ध्वगामी होगा।

वैशाख महीने की महत्ता से पौराणिक ग्रन्थ भरे पड़े है। कतिपय महीनों की महत्ता के क्रम में वैशाख माह के लिए स्कंदपुराण के 13 अध्यायों में वर्णित इसकी महत्ता से आशय यह निकलता है कि इस महीने में चन्द्रमा, सूर्य, तारे, नक्षत्र इतने अनुकूल हो जाते हैं कि इसके तीसों दिन मानव के लिए लाभप्रद हो जाते हैं। प्रतिकूलताएं निष्प्रभावी हो जाती हैं जिसकी वजह से अक्षय तृतीया को बिना किसी गणना के शुभकार्य सम्पादित किए जाते हैं। वैसे तो तृतीया तिथि को ललिता देवी की उपासना के माध्यम से व्रत का विधान नारदपुराण में महिलाओं के लिए किया गया है, लेकिन वैशाख की अक्षय तृतीया का व्रत-उपवास स्त्री-पुरुष दोनों के लिए लाभदायी कहा गया है।

मानव-जीवन ही नहीं हर जीव-जंतु के लिए प्राण रूप में आहार की व्यवस्था प्रकृति ही करती है। इसके लिए ऊष्मा और जल की व्यवस्था पिता के रूप में आकाश करता है। सूर्य की परिक्रमा करती धरती वसन्त ऋतु के बाद ग्रीष्म में सूर्य के अति निकट हो जाती है। जिससे गर्मी बढ़ती है। वास्तविक रूप से देखा जाए आने वाली ग्रीष्म ऋतु का सामना करने के लिए प्राकृतिक शक्ति-संचय का भी महीना वैशाख है।

आध्यात्मिक दृष्टि से हर माह की पूर्णिमा के नक्षत्रों पर महीनों का नामकरण किया गया है। वैशाख की पूर्णिमा को विशाखा नक्षत्र का प्रभुत्व रहता है। विशाखा का शाब्दिक अर्थ शाखा-रहित है। जीवन की अनेकानेक शाखाओं से मुक्ति का अर्थ ही स्थितिप्रज्ञ की स्थिति है। जीवन में तामसिक प्रवृतियां का सर्वाधिक असर होता है। ये प्रवृत्तियां मन को स्थिर नहीं होने देती है। व्यक्ति ऐंद्रिक सुख की ओर भागता है। इससे लड़कर एवं राजस प्रवृत्तियों को पार कर सात्विक स्तिथि में पहुंचना ही सत्ययुग का अवतरण है। इससे भी ऊपर चले जाना राम और कृष्ण के आदर्शों पर चलना स्वयमेव हो जाएगा।

वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को परशुराम के अवतरण की आध्यात्मिक कथाओं में पूरी तरह प्रकृति-विज्ञान एवं आधुनिक-विज्ञान का भाव छुपा हुआ है। परशुराम भृगुवंशी हैं। भृगु के पुत्र ऋचीक हुए जिससे इंद्र के अवतार गाधि की बेटी सत्यवती हुई। ऋचीक का विवाह सत्यवती से हुआ। ऋचीक ने एक बार खीर पत्नी और सास के लिए प्रदान किया, लेकिन इसे ग्रहण करने में उलटफेर हो गया। सत्यवती ने अपनी माँ की खीर खा ली। ऋचीक असमंजस में पड़ गए। सत्यवती ने अनुनय विनय किया कि पुत्र के रूप में क्रोधी न होकर पौत्र के रूप में क्रोधी बालक जन्म ले। इस प्रार्थना से सत्यवती को पुत्र के रूप में जमदग्नि हुए और जमदग्नि के पुत्र परशुराम हुए।

चित्ररथ राजा के विलासी स्वरूप से जमदग्नि की पत्नी रेणुका विचलित हो गयी तो जमदग्नि ने परशुराम से अपनी माता रेणुका के बध करने के लिए कहा। परशुराम के अन्य चार भाई तो हत्या करने से मुकर गए लेकिन परशुराम ने माता रेणुका का बध कर दिया। इस कथा के गूढार्थ पर जरूर चिंतन की जरूरत है, क्योंकि रेणुका का अर्थ पृथ्वी है तो रेतकण भी है। परशुराम हाथ में परसु (फरसा) लिए रहते है। कृषि की दृष्टि से फरसा कृषक का यंत्र है। इसी से वह फसल काटता है और कृषि-भूमि को उपजाऊ बनाता है। धरती पर फरसा चलाकर कृषक वैशाख में रबी की फसलों को काटता है और अगली फसल के लिए गोड़ाई भी करता है। परशुराम के साथ राजा सहस्रार्जुन से युद्ध की कथा भी महाभारत ग्रन्थ में उल्लिखित है।

सहस्रार्जुन राजा होकर अपने दायित्व से च्युत हो जाता है। ज्ञान के भंडार जमदग्नि की हत्या तथा उनके आश्रम के पेड़ पर्यावरण संरक्षण पद्धति को नष्ट करता है। पेड़-पौधों को उजाड़ देने पर परशुराम ने बदला लिया। महाभारत के शांति पर्व में भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा भी है कि लोकहित में ऋषि अपने ज्ञान एवं तपोबल तथा राजा अपने बाहुबल से प्रजा को सुख, शांति तथा उल्लास प्रदान करे। चाणक्य भी इसी तरह की व्यवस्था के हिमायती थे। इसमें जो भी अपने दायित्व से विचलित होता है, वह दंड का भागीदार होता है। कृषि क्षेत्र में फांवड़े से खेती करते किसान भूमि पर ही प्रहार नहीं बल्कि वह कृषि-भूमि की उर्वराशक्ति को नष्ट करने वाले जीवों को मारता भी है।

सहस्रार्जुन को कृषि का प्रदूषण-पदार्थ माना जाए तो ज्यादा उपयोगी होगा, क्योंकि जिस धरती से अनाज के रूप में प्राणशक्ति पैदा हो रही है, उसके संरक्षण की प्लानिंग और कार्रवाई दोनों आवश्यक है। इसी प्रकार आधुनिक कम्प्यूटर साइंस के रूप में लिया जाए तो कम्प्यूटर के मुख्य संयंत्र ‘मदरबोर्ड’ में यदि वायरस आ जाता है तो उसे कम्प्यूटर इंजीनियर अपने तकनीकी ज्ञान से वायरसमुक्त करता है। माता रेणुका की हत्या और पुनजीवित होने की इस कथा में ऐसी टेक्नोलाजी दिखाई देती है। इसके अलावा परशुराम का जो प्रसंग भगवान राम के धनुषभंग के समय भी आता है, वह भी पूरी तरह विज्ञान सम्मत है। परमाणु शस्त्र की तरह घातक शिव के धनुष को नष्ट करने से जो पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ा उसे विष्णु भगवान के धनुष से अनुकूल बनाने के लिए परशुराम भगवान राम के पास आए थे। संवाद में कठोरता ऋषि-संस्कृति एवं राज-संस्कृति में वैभिन्यता की वजह से स्वाभाविक है। दो राष्ट्राध्यक्षों की शिखरवार्ता के रुप में इसे देखा जाना चाहिए।

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