जानिए कैसे तकनीक से आसान हो रही है किसानो की जिंदगी और बढ़ रहा है लाभ : डिजिटल एग्रीकल्चर

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नई तकनीकों और पद्धतियों से हो रहे उत्पादन में वृद्धि और मुनाफे में बढ़ोत्तरी

मप्र : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्रामीण समुदाय के सशक्तीकरण के लिए व गाँवों में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए 1 जुलाई 2015 को डिजिटल इंडिया का शुभारंभ किया था, उनके इस प्रयास ने पूरे देश में सेवाओं की डिजिटल डिलीवरी को सक्षम किया और डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा दिया। देश की 68 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है और कृषि जनसंख्या का 58 फीसदी आजीविका का मुख्य स्रोत है। इसलिए भारत में डिजिटल कृषि की भूमिका पर ध्यान देना बहुत जरूरी है।

फिलहाल पूरे विश्व के सामने एक बड़ी समस्या है और वह है खाद्य सुरक्षा यानि दुनिया के हर व्यक्ति को आहार मुहैया कराना। कुछ साल पहले तक किसान पुराने पारंपरिक तरीकों से खेती करते आ थे। उनके पास इतने साधन और सुविधाएं नहीं थीं कि वे खेती में नए प्रयोग कर पाएं या खेती में होने वाली समस्याओं से निपट पाएं, लेकिन पिछले कुछ समय में जिस तरह किसान डिजिटली सक्षम हुए हैं उससे कृषि क्षेत्र का काफी विकास हुआ है। साथ ही किसानों के उत्पादन में वृद्धि और मुनाफे में भी बढ़ोत्तरी हुई है।

डिजिटलाइजेशन के चलते बाजार में बहुत से मोबाइल ऐप है जो किसानो को डिजिटली सक्षम बना रहे है जिसका एक त्वरित उदहारण है सिरोलिया, उज्जैन के किसान मोहन पाटीदार। उज्जैन सोयाबीन के उत्पादन का बेल्ट है। मोहन जी पिछले कई वर्षो से सोयाबीन की खेती करते आ रहे है परन्तु दिन पे दिन उनका लाभ कम होता जा रहा था। गत वर्ष 2017 में मोहन जी ने ग्रामोफोन (एक मोबाइल ऐप जो किसानो की सहायता के लिए तत्पर है) की सलाह पर सोयाबीन की जगह मिर्ची की फसल से 170 फीसदी अधिक मुनाफा कमाया। वो बताते है कि िउन्होंने ग्रामोफोन की सलाह पर एक प्रयोग किया और सिर्फ 0.3 एकड़ पर मिर्ची की फसल लगाई और 4.7 एकड़ पे सोयाबीन, जो की वो कई वर्षो से लगाते आ रहे है।

इस प्रयोग का नतीजा ये रहा कि सोयाबीन की फसल पर उनकी लागत 1,12,800 रूपये आई और उनका कुल फायदा हुआ 70,500 रूपये का जबकि मिर्ची की फसल, जो उन्होंने सिर्फ 0.3 एकड़ में लगाई थी उसकी लागत सिर्फ 10,000 रूपये आई और इसका राजस्व उन्हें 50,000 रूपये मिला। इसका मतलब है की 40,000 रूपये का प्रत्यक्ष लाभ।

इस रुझान के पक्ष में, व्यय, प्राप्त राजस्व और लाभ के सभी सटीक दर के साथ इस किसान का एक जीवंत उदाहरण पर्याप्त है। स्मार्टफोन उपयोगकर्ता होने के बाद उसके पास अपनी फसलों के लिए बेहतर विकल्प है और उज्जैन में 50 से अधिक किसानों ने इस क्षेत्र में सोयाबीन के साथ मिर्च की एक फसल बोना शुरू कर दिया है।

तो निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि ग्रामीण इलाकों में नई प्रौद्योगिकीयों का उपयोग अब भी सीमित है और कई किसान इस प्रगति से अनजान हैं। लेकिन आशा है कि ग्रामीण इलाकों में मौजूद इस अंतर को ग्रामोफोन समाप्त कर सकता है।

परंपरागत फसलों की खेती से हटकर किसान लाभकरी फसलों की खेती करने लगे हैं, जहां कम लागत में अधिक उत्पादन और मुनाफा हो रहा है। ऐसा संभंव हुआ है, कृषि के डिजिटिलाइजेशन से। किसान अब खेती से जुड़ी अपनी समस्याओं से निपटने, नई कृषि विधियां सीखने और दुनिया भर में हो रहे कृषि प्रयोगों के बारे में जानने के लिए फेसबुक, व्हॉट्स एप, यूट्यूब जैसे साधनों से जुड़ रहे हैं। खेती को बेहतर बनाने में सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े ये प्लेटफॉर्म काफी काम आ रहे हैं। भारत में आज भी ज्यादातर खेती मौसम के हालत पर टिकी है, जिसमें ज्यादा जोखिम है, लेकिन किसान घर बैठे कृषि वैज्ञानिकों के बताए तरीकों से इन समस्यायों से निपट रहे हैं।

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